दंश किसका
वंश किसका कैसा
मानवता का।
वंश किसका कैसा
मानवता का।
पूरी दुनिया
पाशुता आचरण
दिखता नहीं ।
सत्ता मद में
अंधे हो,बहरे हो
या और कुछ।
पर इंसान
नहीं हो सकते हो
प्रतिघात से।
सम्भल जाओ
डर ने तुम्हें डरा
ही तो रखा है।
-डॉ लाल रत्नाकर
मुझे लगता है कि जिन लोगों ने या जिसने इस विधा का आविष्कार किया होगा वह बहुत ही तार्किक और प्रासंगिक रहा होगा और उसके समय में भी बहुत-बहुत भयावह परिस्थितियां रही होगी कम शब्दों के माध्यम से गंभीर बात कह देना आमतौर पर जो बड़े-बड़े भाषणों से संभव नहीं होता।